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[राजनीति]

ग्रीनलैंड पर ट्रंप के दावे को यूरोपीय देशों ने नकारा: ‘ग्रीनलैंड केवल वहां की जनता का है’

जर्मनी, फ्रांस, इटली और ब्रिटेन सहित यूरोपीय देशों ने एक साझा बयान में ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के दावे का खंडन किया। बयान में कहा गया कि ग्रीनलैंड का फैसला वहां के लोगों का अधिकार है—इस मुद्दे ने यूरोप-अमेरिका रिश्तों में नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है।

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व्यापार जगत न्यूज़ डेस्क
PUBLISHED

ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के दावे पर यूरोप में राजनीतिक प्रतिक्रिया तेज हो गई है। रिपोर्टिंग के मुताबिक जर्मनी, फ्रांस, इटली और ब्रिटेन जैसे प्रमुख यूरोपीय देशों ने एक साझा बयान जारी कर स्पष्ट किया कि ग्रीनलैंड केवल वहां की जनता का है और इसके भविष्य को लेकर निर्णय का अधिकार किसी बाहरी देश का नहीं हो सकता।

ग्रीनलैंड पर ट्रंप के दावे को यूरोपीय देशों ने नकारा: ‘ग्रीनलैंड केवल वहां की जनता का है’
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इस बयान को यूरोपीय एकजुटता के संकेत के रूप में देखा जा रहा है, खासकर ऐसे समय में जब भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में आर्कटिक क्षेत्र का महत्व लगातार बढ़ रहा है। ग्रीनलैंड की रणनीतिक स्थिति, प्राकृतिक संसाधनों और सुरक्षा आयामों के कारण यह इलाका लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय ध्यान का केंद्र रहा है, और इसी संदर्भ में बयान का राजनीतिक वजन बढ़ जाता है।

यूरोपीय देशों के रुख का संदेश यह है कि क्षेत्रीय संप्रभुता और स्थानीय जन-इच्छा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। रिपोर्ट के मुताबिक बयान में यह लाइन खींची गई कि ग्रीनलैंड पर अंतिम अधिकार वहां रहने वाले लोगों के पास है—यानी किसी भी तरह के ‘दावे’ या ‘मालिकाना’ जैसी भाषा को यूरोप स्वीकार नहीं करेगा।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह विवाद सिर्फ एक बयान या कूटनीतिक प्रतिक्रिया तक सीमित नहीं है। यह यूरोप और अमेरिका के बीच प्राथमिकताओं, गठबंधन-राजनीति और रणनीतिक संवाद के तरीकों को भी उजागर करता है।

यह भी ध्यान देने वाली बात है कि आर्कटिक में जलवायु परिवर्तन के चलते नए समुद्री मार्गों और संसाधन-खोज की संभावनाएं बढ़ रही हैं, जिससे इस क्षेत्र पर वैश्विक प्रतिस्पर्धा तेज होती दिखती है। ऐसे में, ग्रीनलैंड को लेकर सार्वजनिक दावों पर प्रतिक्रिया के जरिए यूरोपीय देशों ने यह संकेत दिया है कि वे इस क्षेत्र में नियम-आधारित व्यवस्था और स्थानीय अधिकारों की बात पर जोर देंगे।

आने वाले महीनों में यह देखना अहम होगा कि इस मुद्दे पर यूरोप-अमेरिका संवाद किस दिशा में जाता है और क्या यह विवाद आर्कटिक नीति, सुरक्षा सहयोग और कूटनीतिक समन्वय पर कोई ठोस असर डालता है।

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