महबूबा मुफ्ती: गणतंत्र दिवस को परेड तक सीमित नहीं होना चाहिए, संविधान के पालन पर जोर
पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने कहा कि गणतंत्र दिवस का मतलब केवल परेड और भाषण नहीं, बल्कि संविधान के पालन और नागरिक अधिकारों की रक्षा भी है। उन्होंने संस्थाओं की भूमिका और संवैधानिक मूल्यों पर सार्वजनिक चर्चा की जरूरत बताई।
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- व्यापार जगत न्यूज़ डेस्क
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26 जनवरी 2026 को गणतंत्र दिवस समारोह के दौरान पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती का एक राजनीतिक बयान चर्चा में रहा। रिपोर्ट के मुताबिक मुफ्ती ने कहा कि गणतंत्र दिवस को केवल परेड और भाषणों तक सीमित नहीं होना चाहिए। उनके अनुसार यह दिन संविधान के पालन को सुनिश्चित करने और नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों—जैसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धर्म की स्वतंत्रता और मतदान के अधिकार—की याद दिलाने का भी अवसर है।

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि मुफ्ती ने सोशल मीडिया मंच ‘X’ पर एक पोस्ट के जरिए अपनी बात रखी। उन्होंने 15 अगस्त 1947 और 26 जनवरी 1950 के प्रतीकात्मक महत्व का संदर्भ देते हुए कहा कि आजादी मिलने के बाद संविधान ने नागरिकों को गरिमा के साथ जीने का अधिकार दिया। यह तर्क भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में ‘आज़ादी’ और ‘संवैधानिक अधिकार’ के बीच के अंतर को रेखांकित करता है, जिसे विपक्षी दल अक्सर राजनीतिक बहस के केंद्र में रखते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार मुफ्ती ने यह चिंता भी जताई कि संविधान से बनी संस्थाएं मजबूत होने के बावजूद कुछ मामलों में उनका इस्तेमाल देश की अवधारणा को कमजोर करने के लिए किया जा रहा है। इस तरह के बयान आम तौर पर संस्थागत स्वायत्तता, लोकतांत्रिक जवाबदेही और संघीय संतुलन जैसी बहसों से जुड़ जाते हैं। इसलिए राजनीतिक दृष्टि से यह टिप्पणी केवल एक दिन का संदेश नहीं, बल्कि व्यापक विमर्श का हिस्सा है।
गणतंत्र दिवस के मौके पर इस तरह के विचार सार्वजनिक रूप से रखने का उद्देश्य प्रायः यह होता है कि राष्ट्रीय उत्सव की चमक-दमक के साथ-साथ मूल संवैधानिक मूल्यों की भी पुनर्स्मृति कराई जा सके। साथ ही, ऐसे बयानों पर राजनीतिक प्रतिक्रिया भी आती है—समर्थक इसे संवैधानिक चेतना का संदेश मानते हैं, जबकि आलोचक इसे अवसर विशेष पर राजनीतिक एजेंडा बताकर खारिज करते हैं।
आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इस बयान पर मुख्यधारा राजनीतिक दलों और प्रशासनिक स्तर पर कैसी प्रतिक्रिया आती है। संवैधानिक अधिकारों और संस्थागत भूमिकाओं पर बहस अक्सर चुनावी मौसम, नीति-निर्णयों और सार्वजनिक आंदोलनों के दौरान और तेज हो जाती है—इसलिए गणतंत्र दिवस जैसे दिन कही गई बात लंबे समय तक राजनीतिक संदर्भ में लौटती रहती है।
- मुख्य बात: गणतंत्र दिवस को ‘संविधान-दिवस’ की भावना से जोड़ने पर जोर
- थीम: संस्थाओं की भूमिका और नागरिक अधिकार
- माध्यम: सोशल मीडिया पोस्ट और सार्वजनिक टिप्पणी