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[व्यापार]

ईयू-मर्कोसुर व्यापार समझौते को हरी झंडी, फ्रांस समेत कई देशों के किसान नाराज़: आगे क्या हो सकता है

यूरोपीय संघ ने दक्षिण अमेरिकी समूह मर्कोसुर के साथ लंबे समय से अटके व्यापार समझौते को समर्थन दे दिया। जहां यूरोपीय आयोग इसे रणनीतिक उपलब्धि बता रहा है, वहीं फ्रांस सहित कुछ देशों में किसान और राजनीतिक दल इसे घरेलू कृषि पर खतरे के रूप में देख रहे हैं।

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व्यापार जगत न्यूज़ डेस्क
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यूरोपीय संघ ने मर्कोसुर (अर्जेंटीना, ब्राजील, पराग्वे और उरुग्वे) के साथ वर्षों से अटके बड़े व्यापार समझौते को आगे बढ़ाने के लिए समर्थन दे दिया है। रिपोर्टिंग के मुताबिक ब्रसेल्स में राजदूतों की बैठक के बाद 27 में से बहुमत देशों ने इस डील के पक्ष में रुख अपनाया। इसे ईयू नेतृत्व ने वैश्विक अनिश्चितता के बीच एक बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश किया है।

ईयू-मर्कोसुर व्यापार समझौते को हरी झंडी, फ्रांस समेत कई देशों के किसान नाराज़: आगे क्या हो सकता है
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यूरोपीय आयोग की प्रमुख उर्सुला फॉन डेय लाएन ने इसे इस बात के प्रमाण के तौर पर बताया कि यूरोप ‘अपना रास्ता खुद तय’ कर सकता है और एक भरोसेमंद साझेदार के रूप में खड़ा है। जर्मनी के चांसलर फ्रीडरिष मैर्त्स ने भी इसे रणनीतिक संकेत कहा। मर्कोसुर पक्ष की ओर से ब्राजील के राष्ट्रपति लुइस इनासियो लूला दा सिल्वा ने इसे बहुपक्षवाद के लिए एक अहम दिन बताया।

हालांकि, यह सहमति सर्वसम्मति नहीं थी। रिपोर्ट के अनुसार फ्रांस समेत कुछ देशों में विरोध मुखर रहा। फ्रांस में राजनीतिक खेमों और किसानों की चिंता यह बताई गई कि इससे घरेलू कृषि क्षेत्र को नुकसान हो सकता है। आयरलैंड, पोलैंड, हंगरी और ऑस्ट्रिया ने भी इस समझौते के खिलाफ वोट दिया, लेकिन यह विरोध डील को रोकने के लिए पर्याप्त नहीं रहा क्योंकि अंततः इटली ने समर्थन का रुख अपनाया।

ईयू के मुताबिक इस डील से यूरोपीय कंपनियों को हर साल अरबों यूरो के शुल्क की बचत हो सकती है और लैटिन अमेरिकी बाजारों तक वाहन, मशीनरी, वाइन और अन्य उत्पादों की पहुंच आसान हो सकती है। समर्थक इसे यूरोप की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने वाला कदम मानते हैं और यह भी तर्क दिया जा रहा है कि रणनीतिक संसाधनों के मामले में विविधीकरण का अवसर मिल सकता है।

विरोध करने वालों का कहना है कि ब्राजील और पड़ोसी देशों से आने वाले अपेक्षाकृत सस्ते कृषि उत्पाद—जैसे मांस, चीनी, चावल, शहद और सोयाबीन—यूरोप के किसानों पर दबाव बढ़ा सकते हैं। यही वजह है कि कई देशों में किसानों ने प्रदर्शन, सड़क जाम और ट्रैक्टर मार्च जैसी कार्रवाइयों के जरिए नाराज़गी जताई।

राजनीतिक रूप से भी यह मामला ‘अभी खत्म’ नहीं माना जा रहा। रिपोर्ट के मुताबिक फ्रांस की कृषि मंत्री ने संकेत दिया है कि अंतिम लड़ाई अभी बाकी है, क्योंकि यूरोपीय संसद में इस डील पर आगे मतदान होने की संभावना है। यानी हरी झंडी के बाद भी, इस व्यापार समझौते की राह में राजनीतिक और सामाजिक विरोध के कई पड़ाव सामने आ सकते हैं।

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