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IPO लॉक-इन एक्सपायरी: जनवरी 2026 में टाटा कैपिटल, LG समेत 27 कंपनियों के शेयरों में हलचल की संभावना

Moneycontrol Hindi के मुताबिक, जनवरी 2026 में टाटा कैपिटल और LG सहित 27 कंपनियों के IPO लॉक-इन खत्म होंगे। इससे बाजार में शेयर सप्लाई बढ़ सकती है और कुछ स्टॉक्स में तेज वॉलैटिलिटी देखी जा सकती है।

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व्यापार जगत न्यूज़ डेस्क
PUBLISHED

जनवरी 2026 शेयर बाजार के लिए खास बनता दिख रहा है। Moneycontrol Hindi की रिपोर्ट के अनुसार, टाटा कैपिटल और LG समेत 27 कंपनियों में IPO लॉक-इन एक्सपायरी होने जा रही है। लॉक-इन खत्म होने का सीधा मतलब यह है कि पहले जो शेयरधारक तय अवधि तक अपने शेयर नहीं बेच सकते थे, वे अब ट्रेडिंग के लिए उन शेयरों को बाजार में ला सकेंगे।

IPO लॉक-इन एक्सपायरी: जनवरी 2026 में टाटा कैपिटल, LG समेत 27 कंपनियों के शेयरों में हलचल की संभावना
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जब किसी स्टॉक में अचानक सप्लाई बढ़ती है, तो कीमत पर दबाव या तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। इसलिए रिपोर्ट में संकेत दिया गया है कि इस अवधि के आसपास कुछ शेयरों में वॉलैटिलिटी बढ़ सकती है। यह हर कंपनी में समान नहीं होगा, क्योंकि निवेशकों का व्यवहार स्टॉक की मौजूदा कीमत, लिस्टिंग के बाद के रिटर्न और आगे की अपेक्षाओं पर निर्भर करता है।

क्यों अहम है लॉक-इन एक्सपायरी?

IPO के बाद प्री-लिस्टिंग निवेशकों, प्रमोटर ग्रुप या एंकर निवेशकों पर अक्सर लॉक-इन लागू होता है ताकि शुरुआती महीनों में शेयर की सप्लाई सीमित रहे और प्राइस डिस्कवरी व्यवस्थित तरीके से हो। लेकिन जैसे ही यह अवधि खत्म होती है, बाजार में उपलब्ध फ्री-फ्लोट शेयर बढ़ जाता है।

यदि शेयर मुनाफे में है, तो कुछ निवेशक आंशिक या पूरी मुनाफावसूली कर सकते हैं। वहीं अगर शेयर नुकसान में है, तो निवेशक होल्ड करना बेहतर समझ सकते हैं—इससे यह भी संभव है कि सप्लाई बढ़े लेकिन बिकवाली बहुत तेज न हो। दोनों ही स्थितियों में ट्रेडर्स और निवेशकों के लिए यह ‘इवेंट विंडो’ महत्वपूर्ण बन जाती है।

एंकर निवेशकों की भूमिका

रिपोर्ट में बताया गया है कि एंकर निवेशकों में म्यूचुअल फंड और विदेशी संस्थागत निवेशक भी शामिल हो सकते हैं और उनके लिए लॉक-इन की अवधि अलग-अलग हो सकती है। जब ऐसे बड़े निवेशक किसी स्टॉक में अपनी होल्डिंग घटाने का निर्णय लेते हैं, तो ऑर्डर साइज बड़ा होने के कारण कीमत पर असर अपेक्षाकृत जल्दी दिख सकता है।

निवेशकों के लिए व्यावहारिक कदम यह हो सकता है कि वे संबंधित कंपनियों की लॉक-इन डेट्स, शेयरहोल्डिंग पैटर्न और हाल के नतीजों/गाइडेंस पर नजर रखें और केवल अफवाहों के आधार पर पोजीशन न बनाएं।

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